लेखक: मनोज सी. जी.

नई दिल्ली, 8 मई 2025
ऑपरेशन सिंदूर के कुछ ही घंटों के भीतर विपक्ष ने बिना किसी शर्त के सरकार को समर्थन देने की घोषणा कर दी — और यह रुख पहले की घटनाओं से काफी अलग था। विपक्ष के तमाम वैचारिक धड़ों ने एक सुर में सरकार के साथ खड़े होने की बात कही।
हालांकि इससे पहले 22 अप्रैल को हुए पहलगाम आतंकी हमले के बाद भी विपक्ष ने आतंकियों और उनके मददगारों के खिलाफ कार्रवाई में सरकार को पूरा समर्थन देने की बात कही थी, लेकिन बाद के दिनों में कांग्रेस ने सुरक्षा और खुफिया तंत्र की विफलताओं पर सवाल उठाए और जवाबदेही तय करने की मांग की थी।
मगर बुधवार को माहौल पूरी तरह से अलग था। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने इस बार सरकार को बिना किसी शर्त के समर्थन दिया और सेना की कार्यवाही की खुलकर प्रशंसा की।
तो अब और पहले में फर्क क्या है?
2019 में पुलवामा हमले और उसके बाद हुए बालाकोट एयरस्ट्राइक के समय, जब देश आम चुनाव की दहलीज पर था, 21 विपक्षी दलों ने संयुक्त बयान जारी कर “सशस्त्र बलों की कुर्बानी के राजनीतिकरण” पर गहरी नाराज़गी जताई थी। उस वक्त उनका आरोप था कि बीजेपी इन घटनाओं को चुनावी लाभ के लिए इस्तेमाल कर रही है।
अब, 2025 में, ऑपरेशन सिंदूर के बाद विपक्ष का स्वर बदल गया है। इस बार वे एकजुट होकर सरकार के साथ खड़े हैं, और इसकी एक वजह यह भी हो सकती है कि पहले हुए आलोचनात्मक रुख का उन्हें राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ा था।
इसके अलावा, अब जनता की संवेदनाएं और सुरक्षा को लेकर सतर्कता बहुत अधिक है। शायद इसीलिए विपक्ष इस बार बिना किसी राजनीतिक आरोप के सीधे समर्थन के साथ सामने आया है।






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